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पञ्चस्तवी • अध्याय 4 • श्लोक 20
त्वं चन्द्रिका शशिनि तिग्मरुचौ रुचिस्त्वं त्वं चेतनासि पुरुषे पवने बलं त्वम्। त्वं स्वादुतासि सलिले शिखिनि त्वमूष्मा निःसारमेव निखिलं त्वदृते यदि स्यात् ।।
हे जगन्माता! आप चन्द्रमा में चान्दनी हैं। सूर्यदेवता में प्रकाश हैं। पुरुष में चेतना हैं। वायु में बल अर्थात् वेग हैं। जल में मिठास हैं और अग्नि में ऊष्णता हैं अर्थात् आप ही समस्त भावाभावात्मक यानी दिखाई देने वाले और न दिखाई देने वाले जगत् का सार हैं। सच तो यह है कि यदि आपकी सत्ता जागतिक पदार्थों में न हो तो ये सभी पदार्थ सत्ता-विहीन अर्थात् फीके हैं। भाव यह है कि आपकी विश्व-व्यापिनी शक्ति से ही सारा संसार अपनी स्वरूप-सत्ता से युक्त दृष्टिगोचर होता है।
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