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पञ्चस्तवी • अध्याय 4 • श्लोक 29
स्थूलासु मूर्तिषु महीप्रमुखासु मूर्तेः कस्याश्चनापि तव वैभवमम्ब यस्याः। पत्या गिरामपि न शक्यते एव वक्तुं सासि स्तुता किल मयेति तितिक्षितव्यम् ।।
हे माता! पृथ्वी इत्यादि जो आपका स्थूल स्वरूप है, उसमें से किसी एक स्वरूप के विभव का निर्णय बृहस्पति पाद भी करने में असमर्थ हैं, उसी आप के स्वरूप के ऐश्वर्य का गुण-गान (मैं अल्पज्ञ मूर्ख) करने का साहस कर रहा हूं अर्थात् आपके पारमार्थिक स्वरूप की स्तुति कर रहा हूं अतः इस मेरी धृष्टता पर आप महानुभाव-स्वभाव वाली माता क्षमा करेंगी यह मेरी आशा है।
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