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पञ्चस्तवी • अध्याय 4 • श्लोक 3
व्योमेति बिन्दुरिति नाद इतीन्दुलेखा- रूपेति वाग्भवतनूरिति मातृकेति । निःष्यन्दमानसुखबोधसुधास्वरूपा विद्योतसे मनसि भाग्यवतां जनानाम् ।।
हे देवी! आप भाग्यशाली भक्त जनों के हृदय में, अपने परमानन्द-बोध स्वरूप से प्रवाहित होती हुई-परमाकाश रूप से, प्रकाश-रूपता से, विमर्श-रूपता से, चन्द्र-कला-रूपता से, सरस्वती के रूप से तथा पूर्णाहन्ता रूप मातृका के स्वरूप से विकसित होती हैं।
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