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पञ्चस्तवी • अध्याय 4 • श्लोक 13
ये भावयन्त्यमृतवाहिभिरंशुजालै राप्यायमान भुवनाममृतेश्वरीं त्वाम्। ते लङ्घयन्ति ननु मातरऽलङ्घनीयां ब्रह्मादिभिः सुरवरैरपि कालकक्ष्याम् ।।
हे माता! अमृत बहाने वाली अपनी किरणों के समूह से तीनों लोकों को आप्यायन करने वाली आप अमृतेश्वरी का जो ध्यान करते हैं, निश्चित रूप से वे ब्रह्मा आदि श्रेष्ठ देवताओं से अलंघनीय अर्थात् पार न किये जाने वाले (भूत, भविष्यत और वर्तमान इस) काल-कलना को पार कर जाते हैं।
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