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पञ्चस्तवी • अध्याय 4 • श्लोक 21
ज्योतींषि यद्दिवि चरन्ति यदन्तरिक्षं सूते पयांसि यदहिर्धरणीं च धत्ते। यद्वाति वायुरनलोयदुदर्चिरास्ते तत्सर्वमम्ब ! तव केवलमाज्ञयैव ।।
हे माता! ये जो सितारे आकाश-मार्ग में इधर-उधर घूमते फिरते हैं, जो यह अन्तरिक्ष-तल वर्षा बहा देता है, जो यह शेषनाग इस समस्त पृथ्वी को धारण किए हुए है, जो यह वायु इधर-उधर चलता रहता है और जो यह अग्नि ऊर्ध्व-मार्ग से चलती हुई दिखाई देती है - यह सभी कुछ तो आप की आज्ञा से ही होता है।
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