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पञ्चस्तवी • अध्याय 4 • श्लोक 10
कल्पोपसंहरणकेलिषु पण्डितानि चण्डानि खण्डपरशोरपि ताण्डवानि। आलोकनेन तव कोमलितानि मात- र्लास्यात्मना परिणमन्ति जगद्विभूत्यै ।।
हे माता! खण्डपरशो टूटा कुल्हाड़ा जिसका आयुध है ऐसे शंकर जी का भयंकर ताण्डव नृत्य जो युगों की संहरण-क्रीड़ा में दक्ष है, वह भी आपके लास्यात्मक नृत्य-रूपता को देखने के फलस्वरूप अपनी चण्डरूपता अर्थात् भयंकर रूपता को छोड़कर अत्यन्त कोमल होकर जगत् को पुनः सुखपूर्वक स्थापित करने में परिणत हो जाता है।
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