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पञ्चस्तवी • अध्याय 4 • श्लोक 30
कालाग्निकोटिरुचिमम्ब षडध्वशुद्धौ वाप्लावनेषु भवतीममृतौघवृष्टिम्। श्यामां घनस्तनतटां सकलीकृतौ च ध्यायन्तः एव जगतां गुरवो भवन्ति ।।
हे माता! कलाध्वा, तत्त्वाध्वा, भुवनाध्वा, वर्णाध्वा, मन्त्राध्वा और पदाध्वा - इन छः-स्वरूप वाले संसार को शुद्ध करने में अर्थात् स्वरूपविश्रान्त्यात्मक संहार करने में जो भक्त-जन आपके स्वरूप का ध्यान करोड़ों कालाग्निरुद्रों के समान बना हुआ करते हैं तथा समस्त संसार-मण्डल का आप्लावन करने में आपका स्वरूप अमृत-पूर्ण वर्षा की तरह देखते हैं तथा इस जगत्-मण्डल का सृजन करने में आपके स्वरूप को कृष्ण-वर्ण से युक्त एवं बोझिल बने हुए स्तनों अर्थात् ज्ञान-क्रिया शक्ति के विकास से युक्त बना हुआ ध्यान करते हैं, वे जन तत्काल ही तीनों लोकों के गुरु बन जाते हैं अर्थात् तीनों लोकों पर विजय प्राप्त करते हैं।
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