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पञ्चस्तवी • अध्याय 4 • श्लोक 32
कुवलयदलनीलं बर्बरस्निग्धकेशं पृथुतरकुचभाराक्रान्तकान्तावलग्नम्। किमिह बहुभिरुक्तैस्त्वत्स्वरूपं परं नः सकलभुवनमातः सन्ततं सन्निधत्ताम् ।। इति अभ्यास्तवः अतुर्थः समासः ।।
हे समस्त भुवनों की मांता! आपका (श्रेष्ठ) स्वरूप कुवलय नामी पुष्पों के पत्ते के समान नीला तथा भूरे चिकने केशों से युक्त है। इसके अतिरिक्त ज्ञान-क्रिया रूपी स्तनों की फैलावट से युक्त आपका सुन्दर वक्षस्थल से सुशोभित शरीर, महादेव के शरीर के साथ सदैव लगा रहता है। ज्यादा कहने से इस समय क्या लाभ है - आपका यह स्वरूप हमें सदा के लिए प्रकट रहे।
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