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पञ्चस्तवी • अध्याय 4 • श्लोक 18
दाक्षायणीति कुटिलेति गुहारणीति कात्यायनीति कमलेति कलावतीति । एका सती भगवती परमार्थतोऽपि संदृश्यसे बहुविधा ननु नर्तकीव ।।
हे माता ! यद्यपि पारमार्थिक दृष्टि से आप भगवती एक ही स्वरूप वाली हो तथापि दक्षप्रजापति की कन्या होने से दाक्षायणी नाम से, साढ़े तोनबार मुड़ी होने से कुण्डलिनी-स्वरूप कुटिला नाम से, हृदय रूपी गुफा में ठहरने के फलस्वरूप गुहारणी नाम से, कत्य-ऋषि की कन्या होने से कात्यायनी नाम से, संकोचविकासात्मक धर्म-युक्त होने से कमला नाम से तथा सृष्टि आदि पांच कृत्यों के करने से कलावती नाम से नर्तकी की तरह अनेक स्वरूपों को धारण करती हुए दिखाई देती हो ।
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