हे माता! तुम्हारी स्तुति करने में अपौरुषेय अर्थात् जिनका परमेश्वर के बिना कोई करने वाला नहीं है ऐसी वेदों की सुन्दर रचनाएं भी कुण्ठित हो जाती हैं। मुझ मूर्ख बालक की यह प्रस्तुत, स्तुति असमीचीन होने पर भी आपको अवश्य आकर्षित और प्रसन्न करती ही है, क्योंकि आप का हृदय भक्तों के प्रेमभाव से सदैव स्नेह से द्रवीभूत होता है।
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