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पञ्चस्तवी • अध्याय 4 • श्लोक 7
दग्धं यदा मदनमेकमनेकधा ते मुग्धः कटाक्षविधिरङ्करयांचकार । धत्ते तदा प्रभृति देवि ! ललाटनेत्रं सत्यं हियेव मुकुलीकृतमिन्दुमौलिः ।।
हे देवी! जब महादेव जी ने कामदेव को अपने तीसरे नेत्र से जला दिया तो आपकी मोहित करने वाली तिरछी चितवन ने पुनः इस कामदेव रूपी कली को अनेकानेक दम्पति-वर्ग में जन्म दिया। अनुमान किया जाता है कि सत्यतः तभी से चन्द्र-कला-धारी शंकर ने लज्जा-वश इस तीसरे ललाट नेत्र को कुछ खुले और कुछ बन्द रूप से अर्धनिमीलित दशा में रखा है।
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