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पञ्चस्तवी • अध्याय 4 • श्लोक 25
शक्तिः शरीरमधिदैवतमन्तरात्मा ज्ञानं क्रिया करणमासनजालमिच्छा। ऐश्वर्यमायतनमावरणानि च त्वं कि तन्न यद्भवसि देवि ! शशाङ्कमौलेः ।।
हे चन्द्रकलाधारी भगवान् शंकर की शक्ति भगवती ! आप ही परा, परापरा और अपरा शक्ति हैं। स्थूल, सूक्ष्म और कारण-शरीर भी आप ही हैं। अधिदैव अर्थात् शरीर में ठहरा हुआ परमात्मा का स्वरूप तथा उस शरीर में स्थित जीवात्मा का स्वरूप आप ही हैं। आप ही ज्ञानशक्ति, क्रिया-शक्ति, तथा इन्द्रियों का समूह भी हैं। परदशा में जो आपका आसन ईश्वर प्रेत-रूपता में ठहरा है, वह भी आप ही हैं। इच्छा-शक्ति, सर्वज्ञतादि ऐश्वर्य तथा तीन आणव-मल इत्यादि आवरण भी आप ही हैं, इसके अतिरिक्त आयतन परमेश्वर का निवास स्थान (मन्दिर) भी आप ही हैं। भाव यह - है कि वह कौन सी वस्तु है जो आप नहीं हैं।
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