मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
पञ्चस्तवी • अध्याय 4 • श्लोक 27
यावत्पदं पदसरोजयुगं त्वदीयं नाङ्गीकरोति हृदयेषु जगच्छरण्ये। तावद्विकल्पजटिलाः कुटिलप्रकारा- स्तर्कग्रहाः समयिनां प्रलयं न यान्ति ।।
हे जगत् को अपने स्वरूप में शरण देने वाली माता! जब तक आपके प्रकाशविमर्शात्मक चरण-कमल-युगल को अपने हृदय में स्थान नहीं दिया जाता है तब तक समस्त मतवादी-जन के संकल्प-विकल्प से दुरुह, कठिन बने हुए तथा दृष्ट अर्थात् कुतर्क-वितर्क से युक्त परस्पर वाद-विवाद करने की टॅव (आदत) समाप्त नहीं होती। भाव यह है कि जब तक साधक को स्वरूप-लाभात्मक आनन्द की प्राप्ति नहीं होती, तब तक वह वाद-विवाद के झमेले में पड़ा रहता है। जब साधक को साक्षात्कार का लाभ होता है तो फिर उसे मौन में ही प्रत्येक निधि छिपी रहती है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
पञ्चस्तवी के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

पञ्चस्तवी के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें