हे जगत् को अपने स्वरूप में शरण देने वाली माता! जब तक आपके प्रकाशविमर्शात्मक चरण-कमल-युगल को अपने हृदय में स्थान नहीं दिया जाता है तब तक समस्त मतवादी-जन के संकल्प-विकल्प से दुरुह, कठिन बने हुए तथा दृष्ट अर्थात् कुतर्क-वितर्क से युक्त परस्पर वाद-विवाद करने की टॅव (आदत) समाप्त नहीं होती। भाव यह है कि जब तक साधक को स्वरूप-लाभात्मक आनन्द की प्राप्ति नहीं होती, तब तक वह वाद-विवाद के झमेले में पड़ा रहता है। जब साधक को साक्षात्कार का लाभ होता है तो फिर उसे मौन में ही प्रत्येक निधि छिपी रहती है।
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