मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
पञ्चस्तवी • अध्याय 4 • श्लोक 1
डों यामामनन्ति मुनयः प्रकृति पुराणीं विद्येति यां श्रुतिरहस्यविदोवदन्ति । तामर्धपल्लवितशङ्कररूपमुद्रां देवीमनन्यशरणः शरणं प्रपद्ये ।।
जिसे सभी मुनि-जन आद्य परा प्रकृति कहते हैं, जिसे वेदान्त-विद आचार्य-वर्ग विद्या नाम से विभूषित करते हैं और जिसने अपने अर्ध-शरीर के संपर्क से प्रफुल्लित बने हुए शंकर के स्वरूप को आनन्द प्रदान किया है उसी भगवती उपा देवी को मैं (अनन्य-शरण) जिसका उस भगवती के बिना कोई सहारा नहीं, प्रणाम करता हूँ।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
पञ्चस्तवी के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

पञ्चस्तवी के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें