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पञ्चस्तवी • अध्याय 4 • श्लोक 26
भूमौ निवृत्तिरुदिता पयसि प्रतिष्ठा विद्याऽनले मरुति शान्तिरतीतशान्तिः । व्योम्नीति याः किल कलाः कलयन्ति विश्वं तासां विदूरतरमम्ब ! पदं त्वदीयम् ।।
हे माता! आप पृथ्वी में निवृत्ति-कला, जल-तत्त्व में प्रतिष्ठा-कला, अग्नि तत्त्व में विद्या-कला, वायु-तत्त्व में शान्ता-कला और आकाश-तत्त्व में शान्ता तोता कला उदित हुई हैं - इस प्रकार जो ये उपर्युक्त पांच कलाएं छत्तीस-तत्त्व रूप जगत् का निर्माण करती हैं, उन समस्त कलाओं से परे आपका स्वरूप है अर्थात् आपका स्थान सर्वोत्कृष्ट है।
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