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पञ्चस्तवी • अध्याय 4 • श्लोक 31
विद्यां परां कतिचिदम्बरमम्ब केचि- दानन्दमेव कतिचित्कतिचिच्च मायाम्। त्वां विश्वमाहुरपरे वयमामनाम साक्षादपारकरुणां गुरुमूर्तिमेव ।।
हे माता! कई तो आपको विद्या का स्वरूप मानते हैं। कई आकाश अर्थात् शून्य-स्वरूप मानते हैं। कुछ लोग आपको आनन्द-स्वरूप ही मानते हैं। कई माया का स्वरूप मानते हैं और कई जन आपको विश्वाकार बतलाते हैं। हम तो आपके स्वरूप को अनन्त-करुणा-पूर्ण साक्षात् गुरु-रूप ही मानते हैं।
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