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पञ्चस्तवी • अध्याय 4 • श्लोक 28
यद्देवयानपितृयानविहारमेके कृत्वा मनः करणमण्डलसार्वभौमम् । याने निवेश्य तव कारणपञ्चकस्य पर्वाणि पार्वति नयन्ति निजासनत्वम् ।।
हे पार्वती। कई विरले भक्त-जन देवयान अर्थात् उत्तरायण रूपी अपान-गति तथा दक्षिणान अर्थात् प्राण-गति-दोनों को काटकर, इन्द्रिय-मण्डल के सम्राट बने हुए मन को आपके (गति-विहीन सुषुम्ना-धाम) रूप मार्ग में लय करते हैं। ऐसा करने पर वे पांच कारणों अर्थात् ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर तथा सदाशिव के मुकुटों को अपना आसन बना देते हैं। तात्पर्य यह है कि जो परमयोगी प्राणापान की गति को रोककर सुषुम्ना-मार्ग में प्रविष्ट होते हैं, वे ब्रह्मा आदि पांच कारणों के स्थान को भी तुच्छ समझते हैं और साथ ही सृष्ट्यादि पांच कृत्यों के नायक बन कर परमोत्कृष्ट शिवधाम को प्राप्त करते हैं।
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