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पञ्चस्तवी • अध्याय 4 • श्लोक 9
चर्माम्बरं च शवभस्मविलेपनं च भिक्षाऽटनं च नटनं च परेत भूमौ । बेतालसंहतिपरिग्रहता च शम्भोः शोभां बिभर्ति गिरिजे ! तव साहचर्यात् ।।
हे पर्वतराज की पुत्री! वस्त्रों के बदले मृगछाला का धारण करना, मुर्दों की राख समस्त शरीर में मलना, इधर-उधर भिक्षा के लिए मारे-मारे घूमना, प्रेत-भूमि में नाचना और वेताल-भैरव आदि के समूह का ग्रहण करना शिव को, आपके साथ चलने से ही शोभा को बढ़ाता है।
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