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पञ्चस्तवी • अध्याय 4 • श्लोक 11
जन्तोरपश्चिमतनोः सति कर्मसाम्ये निःशेषपाशपटलच्छिदुरा निमेषात् । कल्याणि ! दैशिककटाक्षसमाश्रयेण कारुण्यतो भवसि शाम्भववेधदीक्षा ।।
हे कल्याणमयी माता! जिसका फिर से जन्म होने वाला नहीं है, अर्थात् जिस व्यक्ति को मोक्ष होने वाला है उस पुरुष के सभी पाश-पटल अर्थात् आणव, मायीय और कार्म - ये तीनों मल आप अपनी अनुग्राहिका-शक्ति से गुरुदेव की अनुकम्पा का आश्रय लेकर निमेष-मात्र में काट देती हैं और इस प्रकार शाम्भव रूपी वेधदीक्षा उसकी सिद्ध हो जाती है।
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