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पञ्चस्तवी • अध्याय 4 • श्लोक 6
मूलालवालकुहरादुदिता भवानि ! निर्भिद्य षट्सरसिजानि तडिल्लतेव । भूयोऽपि तत्र विशसि ध्रुवमण्डलेन्दुनिःष्यन्दमानपरमामृततोयरूपा ।।
हे भवानी ! आप मूलाधार के आलवाल (वृक्षों की जड़ के पास जल-सिंचन के लिए बनाया हुआ गोलाकार स्थान) रूपी कुहर अर्थात् रन्ध्र से बिजली की रेखा की भांति उदित होकर षट्चक्ररूपी कमलों का भेदन करती हैं तदनन्तर पुनः उसी मूलाधार में प्रवेश करती हैं। इस भांति ब्रह्म-रन्ध्र मण्डल के सहस्रारचक्र में अवस्थित अमाकला रूपी परमानन्द से प्रवाहित उत्कृष्ट अमृत-जल से समस्त शरीर को अमृतमय बना देती हैं। तात्पर्य यह है कि जब कुण्डलिनी शक्ति का उदय साधक के शरीर में होता है तो उसका समस्त शरीर परमामृत-रस से सींचा जाता है।
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