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पञ्चस्तवी • अध्याय 4 • श्लोक 17
ब्रह्माण्ड बुद्बुदकदम्बकसंकुलोऽयं मायोदधिर्विविधदुःखतरङ्गमालः । आश्चर्यमम्ब ! झटिति प्रलयं प्रयाति त्वद्धचानसन्ततिमहावडवामुखाग्नौ ।।
हे माता! यह माया रूपी संसार एक अथाह समुद्र है। इसमें अनेक विचित्र दुःखात्मक तरंगों की मालाएं विद्यमान हैं। अनेक ब्रह्माण्ड रूपी बुलबुलों का समूह इस सागर में पाया जाता है। आश्चर्य है कि जब भी इस ऐसे भयंकर सागर में कोई व्यक्ति आप का ध्यान, अनथक रूप से करता है, तब मानो कि आपका यह ध्यान भी महान वडवाग्नि बन जाता है और ये ऊपर वर्णित बुलबुलों से तथा भिन्न-भिन्न प्रकार के दुःख रूपी तरंगों सहित संसार रूपी समुद्र, अण-मात्र में लय हो जाता है और संसार-समुद्र का नाम सदा के लिए मिट जाता है।
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