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पञ्चस्तवी • अध्याय 4 • श्लोक 16
अर्धेन कि नवलताललितेन मुग्धे ! क्रीतं विभोः परुषमर्धमिदं त्वयेति । आलीजनस्य परिहासवचांसि मन्ये मन्दस्मितेन तव देवि ! जडी भवन्ति ।।
हे मोहित करने वाली देवी! तुम्हारा शरीर नवीन लता के समान सुन्दर है, ऐसे किसलय-सदृश शरीर को शंकर जी को देकर और बदले में उनका कठोर तथा फूहड़ आधा भाग क्यों खरीदा इस भांति सखियों के हास-परिहास युक्त वचनों के प्रति आप केवल अपने मन्द मुस्कान से ही उनके इन परिहास-वचनों को टाल देती हैं। आपके ऐसा करने पर ही वे सखियां मूक बन जाती हैं और फिर से उन्हें ऐसा बोलने का साहस नहीं होता।
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