हे जगत् का शासन करने वाली देवी ! सांसारिक मनुष्यों के सभी सन्ताप अर्थात् आधिदैविक, आधिभौतिक तथा आध्यात्मिक दुःख आपके हो अधीन हैं अर्थात् आप ही उन दुःखों को उत्पन्न करती हैं - इत्यतः उन सांसारिक व्यक्तियों पर दया करके वे दुःख नष्ट करने में आप ही समर्थ हैं। जैसे सूर्य भगवान् की किरणों का समूह गर्मी को उत्पन्न करता है और फिर से वर्षा-रूप में परिणत होकर एक बारगी उसे शान्त कर देता है।
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