मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
पञ्चस्तवी • अध्याय 4 • श्लोक 24
हन्तुं त्वमेव भवसि त्वदधीनमीशे संसारतापमखिलं दयया पशूनाम्। वैकर्तनीकिरणसंहतिरेव शक्ता घर्मं निजं शमयितुं निजयैव वृष्टचा ।।
हे जगत् का शासन करने वाली देवी ! सांसारिक मनुष्यों के सभी सन्ताप अर्थात् आधिदैविक, आधिभौतिक तथा आध्यात्मिक दुःख आपके हो अधीन हैं अर्थात् आप ही उन दुःखों को उत्पन्न करती हैं - इत्यतः उन सांसारिक व्यक्तियों पर दया करके वे दुःख नष्ट करने में आप ही समर्थ हैं। जैसे सूर्य भगवान् की किरणों का समूह गर्मी को उत्पन्न करता है और फिर से वर्षा-रूप में परिणत होकर एक बारगी उसे शान्त कर देता है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
पञ्चस्तवी के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

पञ्चस्तवी के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें