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पञ्चस्तवी • अध्याय 4 • श्लोक 22
सङ्कोचमिच्छसि यदा गिरिजे ! तदानीं वाक्तर्कयोस्त्वमसि भूमिरनामरूपा। यद्वा विकासमुपयासि यदा तदानीं त्वन्नामरूपगणनाः सुकरीभवन्ति ।।
हे पार्वती! जब आप अपने स्वरूप का संकोच करना चाहती हैं, तब आपका स्वरूप नाम-रूप की कलना से अतीत बन कर अनुलेख्य हो जाता है। साथ ही बह स्वरूप वाणी तथा मन का विषय बनकर उससे दूर बहुत दूर चला जाता है। इसके उलट जब आप अपनी स्वरूप-विकासात्मक अवस्था को ग्रहण करती हैं, तो उस दशा में ध्यान करने से भक्त जन आप के स्वरूप को सहज ही प्राप्त करते हैं।
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