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पञ्चस्तवी • अध्याय 4 • श्लोक 19
आनन्दलक्षणमनाहतनाम्नि देशे नादात्मना परिणतं तव रूपमीशे। प्रत्यङ्मुखेन मनसा परिचीयमानं शंसन्ति नेत्रसलिलैः पुलकैश्च धन्याः ।।
हे शासन करने वाली देवी! आनन्द-स्वरूप तथा अहंपरामर्श रूपी नाद से परिणत बना हुआ, अनाहतस्वरूप वाले सहस्रार चक्र में जब अन्तर्मुख मन से आपका स्वरूप देखते हैं तो उस समय वे भाग्यशाली योगी-जन शब्दों से नहीं वरन् नेत्र-अश्रुओं से और पुलकित-भाव से ही उस आपके स्वरूप को जतलाते हैं।
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