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अध्याय 15 — पञ्चदश अध्याय

शिवभारतम्
50 श्लोक • केवल अनुवाद
कवीन्द्र बोले - शत्रुओं ने मुसेखान को पुरंदर के किले पर पराजित किया एवं उसकी विशाल सेना को पराक्रम से पीछे हटा दिया और फतेखान पराजित होकर पुनः वापस आ गया है, इस प्रकार सुनकर महमूद शाह रात-दिन अप्रसन्न रहने लगा।
तब फतेखान के पराजय के कारण अंतःकरण से खिन्न हुआ महमूदशाह, अपने मन में इस प्रकार विचार करने लगा।
अरे! रात-दिन जिनका हमने पालन-पोषण किया, वे क्षत्रिय मराठे अनुकूल समय को प्राप्त करके हम यवनों का विनाश कर रहे हैं।
मेरे आश्रय से ही अत्यधिक समृद्धि को प्राप्त करके उन्मत्त हुआ, यह साहसी शहाजी राजा मेरे आदेश को भी नहीं मानता है।
उस क्रोधी ने जोर का भयानक युद्ध करके पंढरपुर के पास स्थित रणदुल्लाखान को जीत लिया।
इसने अपनी कूटनीति से मलिकंबर को अधीन कर लिया और उसने भयंकर अर्गल के राजा को पराजित किया।
जिसने पिता के समान इसका बहुत समय तक पालन-पोषण किया था, ऐसे उस कपटी शहाजी ने इस निजाम को भी अपनी जाल में फंसा दिया।
कर्नाटक के राजाओं ने मेरी अधीनता को त्यागकर वे कूटनीति के कारण इसकी अधीनता को स्वीकार कर रहे हैं।
बार-बार बुलाने पर भी यह समीप नहीं आया एवं इसने ही हमारे विजयश्री को संशयरूपी गर्त में गिरा दिया।
इसने पहले इब्राहिमशाह को पग-पग पर उपकृत किया था, अतः उसने भी संतुष्ट होकर शहाजी को उच्चपदस्थ किया था।
इस कारण से ही अत्यन्त मार्ग का उल्लंघन करके व्यवहार करने वाले इस शहाजी के सैकड़ों अपराध मैंने माफ कर दिये थे।
किन्तु अक्षम्य एवं बड़े अपराधों को जब मैं क्षमा करने में असमर्थ हुआ तो तब इसको पकड़ने के लिए मैंने मुस्तुफखान को आदेश दिया।
तत्पश्चात् शहाजी को कैद करने के कारण से, इसके दोनों पुत्र संभाजी एवं शिवाजी उद्धत होकर, मुझे डुबाने की इच्छा से युद्ध कर रहे हैं।
अपने पिता के लिए संभाजी ने वहां फरादखान को पराजित किया और यहां शिवाजी ने युद्ध से फतेखान का पलायन करवाया।
उस यशस्वी संभाजी ने वहां फरादखान को पराजित नहीं किया, अपितु आज मेरे मन को ही पराजित किया है। अहो! वह कितना सामर्थ्यशाली है।
जिस शिवाजी के हाथों में आज सिंहगढ़ एवं पुरंदगढ़ है तो वह मुझ शत्रु पर अहंकार क्यों नहीं करेगा?
जहां पर भयंकर युद्ध हुआ है, ऐसे उस भयंकर बड़े पर्वत वाले पुरंदर किले को जीतना हमारे लिए अत्यन्त कठीन है।
इस शाहजी ने संभाजी को बैंगलुर में नियुक्त किया तथा शिवाजी को पुरंदर किले पर नियुक्त किया है तो कैसे हमसे पराजित होंगे?
यदि मैंने संभाजी एवं शिवाजी के पिता को छोड़ा नहीं तो मुझे मेरी इस समृद्ध संपति को तिलांजली देनी पड़ेगी।
अपकारक सांप की तरह यदि इस शहाजी को मैंने छोड़ दिया तो यह अपकारक, मेरा अहित किस कारण से नहीं करेगा?
इसको छोड़ देना चाहिए, यह एक और दूसरा इसको छोड़ना नहीं चाहिए, इन दोनों विचारों में से पहला विचार मेरे लिए हितकारी है।
अपकारी इस सांप का क्रोध मेरी युक्ति के प्रभाव से पूर्णतः निष्पाप हो जायेगा।
मैं इसके सिर पर उसको छोड़ने के, इस उपकार को करके रखूंगा तो यह कुलीन एवं गुणों में अग्रणी शहाजी इसको नहीं भूलेगा।
मन में बहुत देर तक विचार करके चतुर आदिलशाह ने इस विचार को अपने बुद्धिमान मन्त्रियों को बताया और उन्होंने भी यह बिल्कुल ठीक है, ऐसा माना।
तत्पश्चात् मंगल स्नान करके, निर्मलवखों एवं आभूषण को धारण किये हुए मानो अपने परिधि से मुक्त हुए नवीन सूर्य की तरह दिखाई देने वाले, उस शहाजी को अपने समीप लाकर, सम्मान के योग्य स्थान पर बैठाकर और उसको सांत्वना देकर महमूदशाह आनन्द से बोला।
महमूद बोला - मुझ अविवेकी से जो कुछ हुआ वह जानबूझकर नहीं हुआ है, ऐसा समझो। हे राजा! तेरे जैसे ज्ञानी की इस संसार में दुर्जेय कुछ भी नहीं है।
मुस्तुफखान ने या अफजलखान ने अत्यन्त द्वेष से जो कोई बड़ा या छोटा अपराध किया है तो हे राजेन्द्र! उसको मेरा ही मान सकते हैं।
तेरे को देखने की इच्छा से मैंने तेरे लिए अनेक प्रयत्न किए तो मुझे उससे अत्यधिक आनन्द हुआ, तुझे हो या न हो।
मैंने मधुर वाक्यों से बातचीत की है, तुझे कारवास के बंधन से मुक्त किया है, हे राजा! तू कुलीन हैं, अतः मेरे अभीष्ट सिद्धि के लिए तत्पर रहो।
उदारचेत लोग अत्यधिक लघु उपकार से ही संतुष्ट होकर सैंकड़ो अपकारों को भूल जाते हैं और शुद्र मन वाले लोग लघु अहित से ही विचलित होकर हजारों उपकारों को भूल जाते हैं।
दुर्जन हजारों अपकारों को करता है तो भी सज्जन उस पर हजारों उपकार करता ही हैं।
जो लोग दूसरे के द्वारा किए गए उपकार को याद रखते हैं एवं अपने किये हुए उपकारों को भूल जाते हैं, वे ही लोग सज्जनों की दृष्टि में स्मरणशील एवं कृतज्ञ है।
जो राजा उपकार करने में तत्पर लोगों के प्रति उपकार नहीं करता है, उसकी विशाल संपत्ति भी स्वप्न में प्राप्त हुए अमृत के समान है।
हे महाराजा! अभिमान के पर्वत से युक्त ऐसे तेरे छोटे बेटे को उपदेश करो और मेरे सिंहगड़ को मुझे दे दो।
सिंहगढ़ अधीन करने का मेरा निश्चय मुझे मूलतः नहीं छोड़ रहा है। किन्तु मेरे आवेश से पुरन्दर शिवाजी के पास ही रहने दो।
उसी प्रकार जिस संभाजी से पराजित होकर फरादखान ने पलायन किया था, उस बैंगलूर शहर को भी उसको मुझे उपहार के रूप में देनी चाहिए।
श्रेष्ठ लोग सेवकों को प्रतिक्षण कार्य में ही नियुक्त करते हैं। यदि उन्होंने उस काम को नहीं किया तो उनके शीलरक्षण का क्या लाभ हैं?
अपने कार्य की सिद्धि हेतु ही स्वामी सेवक की नियुक्ति करता है एवं अपने कार्य की सिद्धि के लिए ही सेवक स्वामी की सेवा करता है। उन दोनों में से एक ने भी अपने कर्तव्य को पूरा नहीं किया तो दोनों का ही काम नहीं होता है।
तृप्ति के बिना पीने में आनन्द नहीं है एवं प्राण के बिना शरीर शोभा नहीं देता है, हे महाराजा! स्वामी का अनुसरण किये बिना सेवक सुशोभित नहीं होता है।
अत्यधिक कहने से क्या लाभ है? अब मैं तेरा और तू मेरा है, हम दोनों का परस्पर आश्रय ही इस संसार का आधार है।
इस प्रकार अल्प शब्दो में सारगर्भित उपदेश, आदिलशाह ने शहाजी राजा को दिया।
वाचाल महमूदशाह जब उपदेश कर रहा था तब उसका उत्तर शहाजी अपने अर्द्ध मुस्कराहट के साथ दे रहे थे।
मदमस्त महमूदशाह को दोनों किले देना है, मतलब अपने पैरों में बेडियों को डलवाना है, ऐसा उस समय उस बुद्धिमान शहाजी को प्रतीत हुआ।
तत्पश्चात् कैद से मुक्ति पाकर एवं यथायोग्य सत्कार प्राप्त किये हुए उस शहाजी के महलद्वार पर आदिलशाह ने हाथी और घोड़े बंधवा दिये।
तब, जिस प्रकार मेघ समूह के आवरण से चन्द्रमा मुक्त होता है, उसी प्रकार संसार को आनन्द देने वाला शहाजी बड़े संकटों से मुक्त हो गया।
कारावास से मुक्त हुआ वह सम्पूर्ण संसार का बांधव शहाजी ग्रहण से मुक्त हुए सूर्य के समान अतिशय सुशोभित हो रहा था।
उसने मुक्त होते ही बड़ा सैन्यबल संग्रहित किया और उसके उत्कृष्ट तेज से सम्पूर्ण पृथ्वी देवीप्यमान हो गई।
फिर पिता के अलंघनीय आदेश को पाकर महाबाहु संभाजी ने बैंगलोर शहर को तुरन्त छोड़ दिया।
युद्ध करने में समर्थ होते हुए भी शिवाजी ने सर्वथा देने के लिए अयोग्य ऐसे सिंहगड किले को पिता की प्रसन्नता के लिए दे दिया।
तत्पश्चात् अपना मानकर एवं मधुर शब्दों से सत्कार करके और पग-पग पर दिये गए उपहारों से संतुष्ट करके आदिलशाह द्वारा प्रेषित शहाजी विशाल सेना को लेकर शत्रु को जीतने के लिए निकल गया।
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