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शिवभारतम् • अध्याय 15 • श्लोक 46
बन्धुः सर्वस्य लोकस्य मुक्तस्तस्मात् स निग्रहात्। व्यराजततरां तत्र दिवाकर इव ग्रहात् ।।
कारावास से मुक्त हुआ वह सम्पूर्ण संसार का बांधव शहाजी ग्रहण से मुक्त हुए सूर्य के समान अतिशय सुशोभित हो रहा था।
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