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शिवभारतम् • अध्याय 15 • श्लोक 25
अथ तं मंगलस्नानं निर्मलाम्बरभूषणम्। परिवेषविनिर्मुक्त नवीनमिवषूषणम्।। उपह्वरे समानाय्य मानार्हमुपवेश्य च। अनुनीय च सोल्लासं महमूदोऽभ्यभाषत।।
तत्पश्चात् मंगल स्नान करके, निर्मलवखों एवं आभूषण को धारण किये हुए मानो अपने परिधि से मुक्त हुए नवीन सूर्य की तरह दिखाई देने वाले, उस शहाजी को अपने समीप लाकर, सम्मान के योग्य स्थान पर बैठाकर और उसको सांत्वना देकर महमूदशाह आनन्द से बोला।
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