अपने कार्य की सिद्धि हेतु ही स्वामी सेवक की नियुक्ति करता है एवं अपने कार्य की सिद्धि के लिए ही सेवक स्वामी की सेवा करता है। उन दोनों में से एक ने भी अपने कर्तव्य को पूरा नहीं किया तो दोनों का ही काम नहीं होता है।
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