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अध्याय 1 — अवधूत उपनिषद

अवधूत
38 श्लोक • केवल अनुवाद
हे परमात्मन्! आप हम दोनों (गुरु-शिष्य) की साथ-साथ रक्षा करें। हम दोनों का साथ-साथ पालन करें। हम दोनों साथ-साथ शक्ति अर्जित करें। हम दोनों की पढ़ी हुई विद्या तेजस्वी (प्रखर) हो। हम दोनों एक-दूसरे के प्रति कभी ईर्ष्या और द्वेष न करें। हे शक्ति सम्पन्न! (हमारे) त्रिविध तापों (आधिभौतिक, आधिदैविक, आध्यात्मिक) का शमन हो तथा अक्षय शान्ति की प्राप्ति हो।
सांकृति ने भगवान् दत्तात्रेयजी के समीप जाकर पूछा— 'हे भगवन्! अवधूत कौन है? उसकी स्थिति किस प्रकार की होती है? उसका लक्षण कैसा होता है? तथा उसका संसी (सांसारिक व्यवहार) किस प्रकार का होता है?' उनके इन प्रश्नों को सुनकर परम कृपालु भगवान् दत्तात्रेयजी ने कहा—
जो अक्षर अर्थात् अविनाशी (भावयुक्त) हो, वरण करने योग्य हो, संसाररूपी बन्धनों से रहित हो तथा 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्यों के लक्ष्यार्थ के बोध से युक्त हो, उसे ही अवधूत (अक्षर का 'अ', वरेण्य का 'व', धूत-संसार-बन्धन का 'धू' तथा 'तत्त्वमसि' आदि के लक्ष्यार्थ का 'त' लेने से 'अवधूत') कहा जाता है।
जो योगी पुरुष आश्रम एवं वर्ण-व्यवस्था से ऊपर उठकर आत्मा में ही सदैव स्थित रहता हो, वह वर्णाश्रम-रहित योगी "अवधूत" कहलाता है।
उस (योगी) का प्रिय (ब्रह्म) ही सिर है, 'मोद' उसका दायाँ बाजू, 'प्रमोद' बायाँ बाजू तथा 'आनन्द' उसकी मध्य आत्मा है। उसकी (आत्मा की) स्थिति गाय के पैर के सदृश (चार— प्रिय, मोद, प्रमोद एवं आनन्द रूप) हो जाती है।
उस सिर (हर्ष) में, अधः (मोद-प्रमोद) में तथा मध्य (आनन्द) में आत्मबुद्धि नहीं करनी चाहिए (उन्हें आत्मा नहीं मानना चाहिए। तब किसे आत्मा मानना चाहिए? इस पर कहा गया है कि)गोवाल (गौ की पूँछ) के सदृश उस ब्रह्म की पुच्छ-प्रतिष्ठा है। उस ब्रह्म को इसी पुच्छाकार में जानना चाहिए। इस प्रकार ब्रह्म को भली-भाँति जानकर वे (योगी पुरुष) परमगति को प्राप्त करते हैं।
अमरत्व की प्राप्ति न तो विविध कर्मों के द्वारा, न प्रजा के द्वारा और न ही धन के द्वारा होती है। एकमात्र त्याग के द्वारा ही अमरत्व की प्राप्ति की जा सकती है।
अपनी-अपनी इच्छा के अनुसार व्यवहार करना ही उन योगियों का संसार है। उनमें से कितने ही वस्त्र धारण करते हैं और कितने ही दिगम्बर (बिना वस्त्रों के) रहते हैं। उन योगियों के लिए न कुछ धर्म है और न ही कुछ अधर्म। उनके लिए पवित्र एवं अपवित्र आदि का भी कोई भेद नहीं है। (इन्द्रियों को वश में करने के रूप में) वे योगीजन सदा अन्तःकरण में (आत्मा के ध्यानरूप) अश्वमेध यज्ञ किया करते हैं। यही उनका महायज्ञ और महायोग है।
इस प्रकार उन योगियों का सम्पूर्ण चरित्र आश्चर्ययुक्त होता है। उनके इस प्रकार के चित्र-विचित्र आचरण की निन्दा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि यही उनका महाव्रत है। वे अज्ञानी मनुष्यों की भाँति (पाप-पुण्य आदि में) लिप्त नहीं होते। वे सदैव निर्लिप्त भाव से इच्छानुसार विचरण करते रहते हैं।
जिस प्रकार सूर्य सभी प्रकार के रसों को ग्रहण करता है तथा अग्नि सभी कुछ भक्षण कर लेती है, उसी प्रकार योगी पुरुष विषयादि भोगों का उपभोग करता हुआ भी शुद्ध होने के कारण पाप-पुण्य आदि का भागीदार नहीं बनता।
जिस प्रकार चारों ओर से परिपूर्ण होने पर भी अचल प्रतिष्ठा (स्थिर स्थिति) वाले समुद्र में जल प्रविष्ट होता रहता है, उसी प्रकार योगी पुरुष भी सभी विषय-भोगों के रहते हुए अचल बना रहता है और शान्ति को प्राप्त करता है। विषय-भोगों की इच्छा करने वाला कामनायुक्त मनुष्य ऐसी शान्ति को कभी प्राप्त नहीं करता।
अतः सत्य बात तो यह है कि किसी का लय (निरोध) नहीं है, किसी की उत्पत्ति नहीं है, कोई आबद्ध (बँधा हुआ) नहीं है, कोई साधक नहीं है, कोई मुमुक्षु (मोक्ष को प्राप्त करने की इच्छा रखने वाला) नहीं है तथा कोई मुक्त भी नहीं है। यही वास्तविक स्थिति है।
इस लोक एवं परलोक के कृत्यों की सिद्धि के लिए, वैसे ही मुक्ति की सिद्धि के लिए, सर्वप्रथम मुझे बहुत कुछ करना अत्यन्त आवश्यक था; परन्तु अब यह सभी कुछ हो चुका है। इस प्रकार प्रत्येक योग का मुख्यरूप से अनुसंधान करता हुआ वह अवधूत इसी में कृतकृत्य होकर सदैव तृप्त रहता है।
(इसके पश्चात् वह ध्यान करता हुआ कहता है—) अज्ञानीजन पुत्रादि की इच्छा से अत्यन्त दुःखी होकर संसार के आवागमन में फँसते रहे।
किन्तु मैं तो परम आनन्द से परिपूर्ण हूँ। तब फिर किस इच्छा के कारण इस संसार में पुनः फँसूँ? जिन्हें परलोक-गमन की इच्छा हो, वे लोग उस इच्छा से प्रेरित होकर भले ही कर्म किया करें।
परन्तु मैं समस्त लोकों का आत्मा हूँ, सर्वलोकमय बन गया हूँ। तब फिर मैं कोई भी कर्म क्यों करूँ? जिन लोगों को इस बात का अधिकार हो, वे भले ही प्रवचन किया करें अथवा वेदों का अध्यापन करते रहें।
किन्तु मुझे तो इसका अधिकार ही नहीं; क्योंकि मैं निष्क्रिय (क्रियारहित) हूँ। मैं निद्रा, भिक्षा, भोजन अथवा शौच आदि की तनिक भी इच्छा नहीं करता।
जो लोग द्रष्टा-स्तर के हों, वे भले ही अन्य कोई कल्पना करें; परन्तु मुझे किसी अन्य की कल्पना करने से कोई लाभ नहीं। अन्य लोग गुञ्जा (चिरमिरी) की लालिमा के कारण उसमें भले ही अग्नि का आरोप करें, किन्तु उस अग्नि से गुञ्जा का ढेर नहीं जलता। इसी प्रकार मेरे भीतर संसार के धर्म आरोपित ही नहीं हैं। इस कारण मैं किसी का भी भजन नहीं करता।
जो लोग तत्त्व को नहीं जानते, वे भले ही कुछ भी श्रवण करें; किन्तु मैं (अवधूत) तो स्वयं ही तत्त्व को जानने में समर्थ हूँ। फिर मैं किसलिए श्रवण करूँ? जो लोग संशय में पड़े हों, वे मनन करें। मुझे तो किसी भी प्रकार का संशय ही नहीं है, इसलिए मैं (अवधूत) मनन नहीं करता।
जिसको विपर्यास (विपरीत ज्ञान) हुआ हो, वह भले ही निदिध्यासन करे; परन्तु जहाँ विपर्यास ही नहीं है, वहाँ ध्यान की आवश्यकता नहीं होती। शरीर को आत्मा मान लेने का विपर्यास मुझ (अवधूत) को नहीं होता। इस कारण निदिध्यासन की आवश्यकता ही नहीं पड़ती।
मैं मनुष्य हूँ— इस प्रकार का व्यवहार भी विपर्यास (विपरीत ज्ञान) के बिना नहीं होता। यह विपर्यास भी दीर्घकाल से अभ्यास में पड़ी वासना के कारण ही होता है।
प्रारब्ध कर्मों के विनष्ट होने पर ही यह व्यवहार निवर्तित (बन्द) होता है; किन्तु जब तक प्रारब्ध कर्मों का नाश नहीं होता, तब तक सहस्रों बार चिन्तन करने पर भी यह व्यवहार शान्त नहीं होता।
यदि व्यवहार या कर्म करने की इच्छा हो, तो तुम अपनी इच्छानुसार ध्यान करो; परन्तु मेरी दृष्टि में तो कर्मों का कोई व्यवहार ही नहीं है, तब मैं किसलिए ध्यान करूँ?
मुझे विक्षेप (चित्त की अस्थिरता) होता ही नहीं, इसलिए मुझे समाधि-अवस्था की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। जब यह मन विकारग्रस्त होता है, तभी चित्त अस्थिर होता है और उसी समय समाधि की आवश्यकता होती है। मैं तो नित्य ही अनुभवरूप हूँ। समाधि में मुझे इससे भिन्न और क्या अनुभव हो सकता है?
मुझे जो-जो करना था, वह सब मैंने कर लिया; तथा जो कुछ भी प्राप्त करना था, वह भी मैं सदा ही प्राप्त करता रहा।
इस कारण लौकिक, शास्त्रीय अथवा अन्य किसी भी प्रकार का व्यवहार मुझे क्यों करना चाहिए? अतः मैं ऐसा नहीं करता। मुझे किसी भी बात की लिप्तता नहीं है। मैं सहज एवं प्राकृतिक ढंग से जो होता है, उसी में रत रहता हूँ।
अथवा मैं कृतकृत्य (पूर्णकाम) हूँ। फिर भी यदि साधारण लोगों पर अनुग्रह करने की इच्छा से शास्त्राज्ञानुसार आचरण करता हूँ, तो इसमें मेरी क्या हानि है?
देवताओं की स्तुति-अर्चना, भोजन, शौच, शिक्षा आदि में शरीर भले ही लगा रहे। वाणी ॐकाररूपी प्रणव का भले ही जप करती रहे तथा उपनिषदों का पाठ भले ही होता रहे—
बुद्धि सदैव भगवान् विष्णु का चिन्तन भले ही करती रहे अथवा (वह) ब्रह्मलीन ही क्यों न रहे; किन्तु मैं तो केवल साक्षीरूप हूँ। मैं (अवधूत) इनमें से किसी भी कार्य को न स्वयं करता हूँ और न ही किसी से करवाता हूँ।
मैं (अवधूत) कृतकृत्य होने के कारण पूर्णतया तृप्त हूँ तथा जो कुछ भी मुझे प्राप्त करना था, वह सब प्राप्त कर चुका हूँ। इसी प्रकार इस तृप्ति का भाव मैं निरन्तर अपने मन में धारण किए रहता हूँ।
मैं धन्य हूँ—धन्य हूँ; क्योंकि मैं नित्य, अविनाशी अपने आत्मतत्त्व को सहज रूप से ही जानता हूँ। मैं धन्य हूँ—मैं धन्य हूँ; क्योंकि मुझे ब्रह्मानन्द का प्रकाश स्पष्ट रूप से प्राप्त होता है।
मैं धन्य हूँ—मैं धन्य हूँ; क्योंकि अब मैं इस नाशवान् संसार का दुःख बिलकुल भी नहीं देखता। मैं धन्य हूँ—मैं धन्य हूँ; क्योंकि मेरा अज्ञान बहुत पहले ही विनष्ट हो चुका है।
मैं धन्य हूँ—मैं धन्य हूँ; क्योंकि अब मुझे कुछ भी करना शेष नहीं है। मैं धन्य हूँ—मैं धन्य हूँ; क्योंकि जो कुछ भी मुझे प्राप्त करना था, वह सब मैं यहीं पहले ही प्राप्त कर चुका हूँ।
मैं धन्य हूँ—मैं धन्य हूँ; क्योंकि मेरी तृप्ति की इस लोक में कोई उपमा नहीं है। मैं धन्य हूँ—मैं धन्य हूँ। मैं बारम्बार धन्य हूँ—धन्य हूँ।
अहो पुण्य! अहो पुण्य!! यह पुण्य दृढ़तापूर्वक सफल एवं फलित हुआ है। धन्य हैं हम सब।
अहो ज्ञान! अहो ज्ञान!! अहो सुख! अहो सुख!! अहो शास्त्र! अहो शास्त्र!! अहो गुरु! अहो गुरु!! (वास्तव में सफल होने के कारण सब धन्यवाद के पात्र हैं।)
इस प्रकार जो भी मनुष्य इस उपनिषद् का पाठ करता है, वह कृतकृत्य हो जाता है। मदिरापान करने वाला, सुवर्ण की चोरी करने वाला, ब्रह्महत्या करने वाला तथा कृत्याकृत्य (अर्थात् कार्य-अकार्य) करने वाला भी इसका (भावनापूर्वक) पाठ करने से पवित्र (श्रेष्ठ प्रकृतियों वाला) हो जाता है। मनुष्य इसका पाठ करने मात्र से ही पवित्र हो जाता है। मनुष्य इस प्रकार का ज्ञान प्राप्त करने के उपरान्त अपनी इच्छानुसार (आत्म-प्रेरणा से ही श्रेष्ठता एवं पवित्रता की दिशा में) प्रवृत्त हो जाता है। (ब्रह्म) ही सत्य है—यही उपनिषद् है।
हे परमात्मन्! आप हम दोनों (गुरु-शिष्य) की साथ-साथ रक्षा करें। हम दोनों का साथ-साथ पालन करें। हम दोनों साथ-साथ शक्ति अर्जित करें। हम दोनों की पढ़ी हुई विद्या तेजस्वी (प्रखर) हो। हम दोनों एक-दूसरे के प्रति कभी ईर्ष्या और द्वेष न करें। हे शक्ति सम्पन्न! (हमारे) त्रिविध (आधिभौतिक, आधिदैविक, आध्यात्मिक) तापों का शमन हो तथा अक्षय शान्ति की प्राप्ति हो।
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