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अवधूत • अध्याय 1 • श्लोक 15
परमानन्दपूर्णोऽहं संसरामि किमिच्छया। अनुतिष्ठन्तु कर्माणि परलोकयियासवः ॥
किन्तु मैं तो परम आनन्द से परिपूर्ण हूँ, तब फिर कौन सी इच्छा के कारण इस संसार में पुनः फसूं? जिन्हें परलोक गमन की इच्छा हो, वे लोग चाहे उस इच्छा से भले ही कर्म किया करें;
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