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अवधूत • अध्याय 1 • श्लोक 8
स्वैरं स्वैरविहरणं तत्संसरणम्। साम्बरा वा दिगम्बरा वा । न तेषां धर्माधर्मों न मेध्यामेध्यौ । सदा सांग्रहण्येष्ट्या श्वमेधमन्तर्यागं यजते। स महामखो महायोगः ॥
अपनी-अपनी इच्छा के अनुसार व्यवहार करना ही उन योगियों का संसार है। उनमें से कितने ही तो वस्त्रों को धारण करते हैं और कितने ही दिगम्बर अर्थात् बिना वस्त्रों के ही रहते हैं। उन योगियों के लिए न कुछ धर्म है और न ही कुछ अधर्म है, पवित्र एवं अपवित्र आदि भी कुछ नहीं है। (इन्द्रियों को वश में करने के रूप में) सदा संग्रह की दृष्टि से वे (योगीजन) अन्तःकरण में (आत्मा का ध्यान रूप) अश्वमेध यज्ञ किया करते हैं। यही उनका महायज्ञ और महायोग है।
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