विक्षेपो नास्ति यस्मान्मे न समाधिस्ततो मम।
विक्षेपो वा समाधिर्वा मनसः स्याद्विकारिणः ॥
मुझे विक्षेप(चित्त की अस्थिरता) होता ही नहीं, इसलिए मुझे समाधि-अवस्था की आवश्यकता ही नहीं पड़ती।
जब यह मनविकारग्रस्त होता है, तभी चित्त अस्थिर होता है और उसी समय समाधि की आवश्यकता होती है।
मैं तो नित्य ही अनुभवरूप हूँ। समाधि में मुझे इससे भिन्न और क्या अनुभव हो सकता है?
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