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अवधूत • अध्याय 1 • श्लोक 23
विरलत्वं व्यवहतेरिष्टं चेद्भयानमस्तु ते। बाधिकर्मव्यवहृतिं पश्यन्ध्यायाम्यहं कुतः ॥
यदि व्यवहार कर्म करने की इच्छा हो, तो तुम अपनी इच्छानुसार ध्यान करो; परन्तु मेरी दृष्टि में तो कर्मों का कोई व्यवहार ही नहीं, तो मैं किसलिए ध्यान करूँ।
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