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अवधूत • अध्याय 1 • श्लोक 19
शृण्वन्त्वज्ञाततत्त्वास्ते जानन्कस्माच्छृणोम्यहम्। मन्यन्तां संशयापन्ना न मन्येऽहमसंशयः ॥
जो लोग तत्त्व को नहीं जानते, वे भले ही कुछ भी श्रवण करें; किन्तु मैं (अवधूत) तो स्वयं ही तत्त्व को जानने में समर्थ हूँ। फिर मैं किसलिए श्रवण करूँ? जो लोग संशय में पड़े हों, वे मनन करें। मुझे तो किसी भी प्रकार का संशय ही नहीं है, इसलिए मैं (अवधूत) मनन नहीं करता।
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