जो लोग द्रष्टा-स्तर के हों, वे भले ही अन्य कोई कल्पना करें; परन्तु मुझे किसी अन्य की कल्पना करने से कोई लाभ नहीं।
अन्य लोग गुञ्जा(चिरमिरी) की लालिमा के कारण उसमें भले ही अग्नि का आरोप करें, किन्तु उस अग्नि से गुञ्जा का ढेर नहीं जलता।
इसी प्रकार मेरे भीतर संसार के धर्म आरोपित ही नहीं हैं। इस कारण मैं किसी का भी भजन नहीं करता।
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