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अवधूत • अध्याय 1 • श्लोक 18
द्रष्टारश्चेत्कल्पयन्तु किं मे स्यादन्यकल्पनात्। गुञ्जापुञ्जादि दह्येत नान्यारोपितवह्निना । नान्यारोपितसंसार धर्मानेवमहं भजे ॥
जो लोग द्रष्टा स्तर के हों, वे भले ही अन्य कोई कल्पना करें; परन्तु मुझे किसी अन्य की कल्पना करने से कोई लाभ नहीं। अन्य लोग गुञ्जा (चिरमिरी) की लालिमा के कारण उसमें भले ही अग्रि को प्रतिष्ठित करें, किन्तु इस अग्रि से गुजा का ढेर नहीं जलता है। तब फिर मेरे अन्दर तो संसार के धर्म आरोपित ही नहीं, इस कारण मैं किसी का भी भजन नहीं करता।
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