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अवधूत • अध्याय 1 • श्लोक 37
इति य इदमधीते सोऽपि कृतकृत्यो भवति। सुरापानात्पूतो भवति । स्वर्णस्तेयात्पूतो भवति । ब्रह्महत्यात्पूतो भवति । कृत्याकृत्यात्पूतो भवति। एवं विदित्वा स्वेच्छाचारपरो भूयादोंसत्यमित्युपनिषत् ।।
इस प्रकार जो भी मनुष्य इस उपनिषद् का पाठ करता है, वह कृतकृत्य हो जाता है। मदिरापान करने वाला, सुवर्ण की चोरी करने वाला, ब्रह्महत्या करने वाला तथा कृत्याकृत्य (अर्थात् कार्य-अकार्य) करने वाला भी इसका (भावनापूर्वक) पाठ करने से पवित्र (श्रेष्ठ प्रकृतियों वाला) हो जाता है। मनुष्य इसका पाठ करने मात्र से ही पवित्र हो जाता है। मनुष्य इस प्रकार का ज्ञान प्राप्त करने के उपरान्त अपनी इच्छानुसार (आत्म-प्रेरणा से ही श्रेष्ठता एवं पवित्रता की दिशा में) प्रवृत्त हो जाता है। (ब्रह्म) ही सत्य है—यही उपनिषद् है।
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