अहं मनुष्य इत्यादिव्यवहारो विनाप्यमुम्।
विपर्यासं चिराभ्यस्तवासनातोऽवकल्पते ॥
मैं मनुष्य हूँ, इस तरह का व्यवहार भी बिना विपर्यास (विपरीत ज्ञान) के नहीं होता। यह विपर्यास भी दीर्घकाल से अभ्यास में पड़ी वासना के कारण ही होता है।
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