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अवधूत • अध्याय 1 • श्लोक 4
यो विलङ्घयाश्रमान्वर्णानात्मन्येव स्थितः सदा । अतिवर्णाश्रमी योगी अवधूतः स कथ्यते ॥
जो योगी पुरुष आश्रम एवं वर्ण-व्यवस्था से ऊपर उठकर आत्मा में ही सदैव स्थित रहता हो, वह वर्णाश्रम-रहित योगी "अवधूत" कहलाता है।
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