अथवा कृतकृत्योऽपि लोकानुग्रहकाम्यया।
शास्त्रीयेणैव मार्गेण वर्तेऽहं मम का क्षतिः ॥
अथवा मैं कृतकृत्य(पूर्णकाम) हूँ। फिर भी यदि साधारण लोगों पर अनुग्रह करने की इच्छा से शास्त्राज्ञानुसार आचरण करता हूँ, तो इसमें मेरी क्या हानि है?
पूरा ग्रंथ पढ़ें
अवधूत के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।