मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
अवधूत • अध्याय 1 • श्लोक 27
अथवा कृतकृत्योऽपि लोकानुग्रहकाम्यया। शास्त्रीयेणैव मार्गेण वर्तेऽहं मम का क्षतिः ॥
अथवा मैं कृतकृत्य (पूर्णकाम) हूँ। फिर भी यदि साधारण लोगों पर अनुग्रह करने की इच्छा से शास्त्राज्ञानुसार आचरण करता हूँ, तो इसमें मेरी क्या हानि है?
पूरा ग्रंथ पढ़ें
अवधूत के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

अवधूत के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें