मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
अवधूत • अध्याय 1 • श्लोक 29
विष्णुं ध्यायतु धीर्यद्वा ब्रह्मानन्दे विलीयताम्। साक्ष्यहं किंचिदप्यत्र न कुर्वे नापि कारये ॥
बुद्धि सदैव भगवान् विष्णु का चिन्तन भले ही करती रहे अथवा (वह) ब्रह्मलीन ही क्यों न रहे; किन्तु मैं तो केवल साक्षीरूप हूँ। मैं (अवधूत) इनमें से किसी भी कार्य को न स्वयं करता हूँ और न ही किसी से करवाता हूँ।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
अवधूत के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

अवधूत के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें