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अवधूत • अध्याय 1 • श्लोक 29
विष्णुं ध्यायतु धीर्यद्वा ब्रह्मानन्दे विलीयताम्। साक्ष्यहं किंचिदप्यत्र न कुर्वे नापि कारये ॥
बुद्धि सदैव भगवान् विष्णु का चिन्तन भले ही करती रहे या फिर भले ही (वह) ब्रह्मलीन रहे; किन्तु मैं तो केवल साक्षी रूप हूँ। मैं (अवधूत) इनमें से किसी भी काम को कभी भी नहीं करता हूँ और न करवाता ही हूँ।
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