जो अक्षर अर्थात् अविनाशी(भावयुक्त) हो, वरण करने योग्य हो, संसाररूपी बन्धनों से रहित हो तथा 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्यों के लक्ष्यार्थ के बोध से युक्त हो, उसे ही अवधूत(अक्षर का 'अ', वरेण्य का 'व', धूत-संसार-बन्धन का 'धू' तथा 'तत्त्वमसि' आदि के लक्ष्यार्थ का 'त' लेने से 'अवधूत') कहा जाता है।
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