व्यवहारो लौकिको वा शास्त्रीयो वाऽन्यथापि वा।
ममाकर्तुरलेपस्य यथारब्धं प्रवर्तताम् ॥
इस कारण लौकिक, शास्त्रीय अथवा अन्य किसी भी प्रकार का व्यवहार मुझे क्यों करना चाहिए? अतः मैं ऐसा नहीं करता।
मुझे किसी भी बात की लिप्तता नहीं है। मैं सहज एवं प्राकृतिक ढंग से जो होता है, उसी में रत रहता हूँ।
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