विपर्यस्तो निदिध्यासे किं ध्यानमविपर्यये।
देहात्मत्वविपर्यासं न कदाचिद्भजाम्यहम् ॥
जिसको विपर्यास अर्थात् विपरीत ज्ञान हुआ हो, वह भले ही निदिध्यासन करे; परन्तु जहाँ पर विपर्यास ही नहीं, वहाँ पर ध्यान की आवश्यकता नहीं होती। शरीर को आत्मा मान लेने का विपर्यास मुझ (अवधूत) को नहीं होता। इस कारण निदिध्यासन की आवश्यकता ही नहीं पड़ती।
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