कृत्स्नमेतच्चित्रं कर्म।
स्वैरं न विगायेत्तन्महाव्रतम्।
न स मूढवल्लिप्यते ॥
इस प्रकार उन योगियों का सम्पूर्ण चरित्र आश्चर्ययुक्त होता है।
उनके इस प्रकार के चित्र-विचित्र आचरण की निन्दा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि यही उनका महाव्रत है।
वे अज्ञानी मनुष्यों की भाँति (पाप-पुण्य आदि में) लिप्त नहीं होते। वे सदैव निर्लिप्त भाव से इच्छानुसार विचरण करते रहते हैं।
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