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अवधूत • अध्याय 1 • श्लोक 17
येऽत्राधिकारिणो मे तु नाधिकारो ऽक्रियत्वतः । निद्राभिक्षे स्नानशौचे नेच्छामि न करोमि च ॥
किन्तु मुझे तो इसका अधिकार ही नहीं; क्योंकि मैं तो निष्क्रिय (क्रिया रहित) हूँ। मैं निद्रा की, भिक्षा की, खान अथवा शौच आदि की तनिक भी इच्छा नहीं करता।
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