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अवधूत • अध्याय 1 • श्लोक 30
कृतकृत्यतया तृप्तः प्राप्तप्राप्यतया पुनः । तृप्यन्नेवं स्वमनसा मन्यतेऽसौ निरन्तरम् ॥
मैं (अवधूत) कृतकृत्य होने के कारण पूर्णतया तृप्त हूँ तथा जो कुछ भी मुझे प्राप्त करना था, वह सब प्राप्त कर चुका हूँ। इसी प्रकार इस तृप्ति का भाव मैं निरन्तर अपने मन में धारण किए रहता हूँ।
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