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अवधूत • अध्याय 1 • श्लोक 10
यथा रविः सर्वरसान्प्रभुङ्क्ते हुताशनश्चापि हि संर्वभक्षः । तथैव योगी विषयान्प्रभुङ्क्ते न लिप्यते पुण्यपापैश्च शुद्धः॥
जिस प्रकार सूर्य सभी प्रकार के रसों को ग्रहण करता है तथा अग्रि सभी कुछ भक्षण कर लेता है, उसी प्रकार योगी पुरुष विषयादि भोगों का उपभोग करता हुआ भी शुद्ध होने के कारण पाप-पुण्यादि का भागीदार नहीं बनता।
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