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अवधूत • अध्याय 1 • श्लोक 6
गोवालसदृशं शीर्षे नापि मध्ये न चाप्यधः । ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठेति पुच्छाकारेण कारयेत्। एवं चतुष्पदं कृत्वा ते यान्ति परमां गतिम् ॥
उस सिर (हर्ष) में, अधः (मोद-प्रमोद) में तथा मध्य (आनन्द) में आत्मबुद्धि नहीं करनी चाहिए (आत्मा नहीं मानना चाहिए, तो किसे मानना चाहिए, इस पर कहते हैं कि) गोवाल (गौ की पूँछ) सदृश उस ब्रह्म की पुच्छ प्रतिष्ठा है, उस ब्रह्म को इसी पुच्छाकार में जानना चाहिए। इस प्रकार ब्रह्म को भली प्रकार जानकर वे (योगीपुरुष) परमगति को प्राप्त करते हैं।
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