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अवधूत • अध्याय 1 • श्लोक 25
नित्यानुभवरूपस्य को मेऽत्रानुभवः पृथक् । कृतं कृत्यं प्रापणीयं प्राप्तमित्येव नित्यशः ॥
मुझे जो-जो करना है, वह वह मैंने किया तथा जो कुछ भी प्राप्त करना है, वह सदा ही प्राप्त करता रहा।
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